Thursday, October 25, 2012

एक कोना, जीवन का।

किस कोने की बात करती हो ?

मैं तो बस अपनी बीते जीवन की कहानी बयान कर रहा था। और तुम हो के ढ़ूढ़ने लगी मेरे जीवन के उस कोने को? वँहा पहुंचना चाहती हो जो मेरे जीवन का अपना कोना है? क्या जानती हो, 
वँहा  तक पहुँचने में सरकना पड़ता है। बहुत ही झुक कर चलना पड़ता है। बरसो लग जाएँगे। थक जाओगी, और फिर कोशिश छोड़ दोगी।

और हाँ, फिर वो कोना तो मेरा है, मेरा अपना। और मैं तो अब वंहा खुद भी जाना नहीं चाहता।


फिर तुम क्यूँ जाना चाहती हो ?

हमारा जीवन।


तेरा जीवन
मेरा जीवन
बिन वस्त्रो के, कुछ वस्त्रो का
कुछ साँसों में, बिन साँसों का
तेरा जीवन
मेरा जीवन

निस्तब्धता को बींधता हुआ
आलिंगन में घेरता हुआ
तेरा जीवन
मेरा जीवन

अस्रुओ की धारा में
स्मृतियों की मधुशाला में
कुछ कौंधता है, कुछ रौंदता है
तेरा जीवन
मेरा जीवन

कभी चलता है कभी रुकता है
कभी हँसता है, कभी रोता है
अनजाने में सब कहता है
तेरा जीवन
मेरा जीवन

रात्री के मध्य में
प्रणय के मोती चुनता है
फिर एक ओर करवट कर के
जाने क्यूँ सो जाता है

तेरा जीवन
मेरा जीवन

- 22/10/2012

Monday, October 8, 2012

सिगरेट का कश।

वो - इतनी सिग्रेट तो मत पियो करो।
मैं - क्यों ?
वो- धुएं में तुम्हारा चेहरा छुप जाता है।
मैं - हां हाँ, अंच्छा बाबा अब और नहीं। देख लो जितना देखना है
वो - फिर क्या मालूम,...
मैं - क्या? हाँ हाँ हाँ, कंही सिगरेट ही मिले न मिले? यंही कहना है न ?